थाने पहुंचकर महिला बोली—“साहब, मैं जिंदा हूं”आधार में मृत, हकीकत में गर्भवती… इलाज और योजनाओं से कट गई महिला
छतरपुर जिले के बमीठा थाना इलाके के इमलहा गांव में सिस्टम ने ऐसा खेल कर दिया कि एक जिंदा महिला को कागजों में मार दिया। नाम है गीता रैकवार—घर में खुशी आने वाली थी, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड ने मातम फैला दिया। गीता गर्भवती हैं, पर आधार के रिकॉर्ड में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया है। नतीजा—आधार सस्पेंड, इलाज बंद, योजनाएं बंद और पहचान पर ताला।
मामला तब खुला जब गीता अपने पति मंगलदीन रैकवार के साथ उज्ज्वला योजना में गैस कनेक्शन लेने पहुंचीं। आधार वेरिफिकेशन हुआ तो सिस्टम बोला—लाभार्थी मृत है। गैस तो दूर, अफसरों ने कहा—पहले खुद को जिंदा साबित कीजिए। यह सुनते ही परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई।आधार सेंटर पहुंचे तो वहां भी ठंडा जवाब—गीता का नाम मृत्यु कॉलम में दर्ज है, इसलिए कार्ड सस्पेंड है। न सरकारी इलाज, न किसी योजना का फायदा, न कोई सुविधा। ऊपर से सलाह—यह गलती यहां नहीं सुधरेगी, भोपाल या दिल्ली जाना पड़ेगा।पिछले एक हफ्ते से गर्भवती गीता और उनके पति दफ्तर-दफ्तर भटक रहे हैं—आधार सेंटर, जनसेवा केंद्र, ब्लॉक ऑफिस—हर जगह एक ही रटा-रटाया जवाब—“हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं”।

सवाल यह कि जिसे इस वक्त सबसे ज्यादा सरकारी सहारे और इलाज की जरूरत है, उसी को सिस्टम की गलती की सजा क्यों?आखिरकार थक-हारकर दंपति बमीठा थाने पहुंचे और लिखित शिकायत दी—“साहब, गीता जिंदा है, आधार में गलती से मृत दर्ज कर दी गई है।” अब उम्मीद है कि पुलिस और प्रशासन की जांच से यह गलत एंट्री हटेगी और आधार फिर से चालू होगा।यह कोई पहला मामला नहीं, लेकिन इसलिए गंभीर है क्योंकि बात एक गर्भवती महिला की है। एक डिजिटल गलती ने उसकी पहचान, अधिकार और सुविधाएं सब कागजों में खत्म कर दीं। इलाज रुका है, योजनाएं रुकी हैं, जिंदगी अटकी है।

अब बड़ा सवाल यही—जब आधार जैसे जरूरी दस्तावेज में ऐसी चूक हो सकती है, तो आम आदमी भरोसा किस पर करे? प्रशासन से उम्मीद है कि वह तुरंत दखल दे, गीता रैकवार को रिकॉर्ड में फिर से जिंदा घोषित करे और उसे बिना रुकावट इलाज व योजनाओं का हक दिलाए।
