बलरामपुर/कुसमी विकासखंड के ग्राम पंचायत अमरपुर के भैंसापाठ गांव से सामने आया बीमार महिला को झेलंगी के सहारे अस्पताल ले जाने का वीडियो अब सिर्फ एक वायरल तस्वीर नहीं रह गया है, बल्कि यह गांव में विकास की जमीनी हकीकत पर बड़ा सवाल बन गया है।सोशल मीडिया पर वीडियो सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने मामले को लेकर जानकारी जारी की है। विभाग के मुताबिक भैंसापाठ गांव से करीब दो किलोमीटर तक सड़क खराब है और नाले पर पुलिया नहीं होने के कारण बड़े वाहनों का आवागमन संभव नहीं है।यानी स्वास्थ्य विभाग की जानकारी में ही यह बात सामने आ गई कि सड़क और पुलिया के अभाव में स्वास्थ्य विभाग की एंबुलेंस गांव तक पहुंचने की स्थिति में नहीं थी।ऐसे में सवाल उठता है कि जब किसी ग्रामीण की अचानक तबीयत बिगड़े, कोई गर्भवती महिला प्रसव पीड़ा में हो या कोई गंभीर दुर्घटना हो जाए, तो आखिर उसे समय पर अस्पताल कैसे पहुंचाया जाएगा?भैंसापाठ की 58 वर्षीय रदनी जब बीमार हुईं तो उन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए परिजनों को झेलंगी का सहारा लेना पड़ा। गांव के कठिन रास्ते को पार करने के बाद उन्हें निजी वाहन से महुआडांड़, झारखंड स्थित अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका उपचार जारी है।स्वास्थ्य विभाग ने यह भी बताया है कि परिजनों ने 108, 102 एंबुलेंस सेवा अथवा किसी स्वास्थ्य कार्यकर्ता से संपर्क नहीं किया था। लेकिन इसके बावजूद इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल सड़क और पुलिया की स्थिति पर ही खड़ा होता है।जब गांव तक एंबुलेंस पहुंचने के लिए रास्ता ही नहीं है, तो सरकारी स्वास्थ्य सेवा का लाभ अंतिम व्यक्ति तक कैसे पहुंचेगा?यह तस्वीर उस परिवार की बेबसी को दिखाती है, जिसे बीमारी की हालत में अपने ही जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था तक पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़ा और अंततः झारखंड के महुआडांड़ में इलाज कराना पड़ा।सरकार गांवों के विकास, सड़क निर्माण और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के दावे करती है, लेकिन भैंसापाठ की यह तस्वीर पूछ रही है

“विकास आखिर गांव की दहलीज तक कब पहुंचेगा?

”“कब बनेगी पुलिया?”“

कब सुधरेगी दो किलोमीटर की सड़क?”“

और कब ऐसी व्यवस्था होगी कि किसी मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए झेलंगी का सहारा न लेना पड़े?”

भैंसापाठ की यह घटना सिर्फ एक मरीज की परेशानी नहीं है। यह उन ग्रामीण परिवारों की बेबसी की तस्वीर है, जो आज भी सड़क और पुलिया जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए इंतजार कर रहे हैं।अब जरूरत सिर्फ बयान या जानकारी देने की नहीं, बल्कि मौके पर जाकर सड़क और पुलिया की समस्या का स्थायी समाधान करने की है।क्योंकि बीमारी किसी को बताकर नहीं आती… लेकिन अगर सड़क ही मरीज तक नहीं पहुंचने देगी, तो जिंदगी और मौत के बीच का यह फासला कौन कम करेगा?

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