बलरामपुर। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर बलरामपुर जिले में आदिवासी समाज की एकजुटता, संस्कृति और परंपरा की अद्भुत झलक देखने को मिली। जिले के विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासी समाज के लोगों ने उत्साह और उमंग के साथ भव्य रैलियां निकालीं। पारंपरिक वेशभूषा, लोक नृत्य, गीत-संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने पूरे माहौल को जीवंत कर दिया। जगह-जगह बड़ी संख्या में समाज के लोग एकत्रित हुए और अपनी संस्कृति, अधिकारों एवं सामाजिक एकता का संदेश दिया।इसी क्रम में कर्रीचलगली में भी विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर भव्य कार्यक्रम एवं रैली का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के जिलाध्यक्ष बसंत कुजूर मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उनके पहुंचने पर आदिवासी समाज के बच्चों एवं युवाओं ने पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति के साथ उनका भव्य स्वागत किया। बच्चों की सांस्कृतिक प्रस्तुति ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों का मन मोह लिया और आदिवासी संस्कृति की समृद्ध विरासत की सुंदर झलक दिखाई दी।कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सर्व आदिवासी समाज के जिलाध्यक्ष बसंत कुजूर ने कहा कि 9 अगस्त केवल विश्व आदिवासी दिवस मनाने का दिन नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज की एकजुटता, पहचान, अधिकार और अपनी संस्कृति एवं परंपराओं के संरक्षण का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि आज आदिवासी समाज के सामने जल, जंगल और जमीन से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जिनके लिए समाज को एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद करने की आवश्यकता है।बसंत कुजूर ने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी संस्कृति, परंपरा, जल, जंगल और जमीन से जुड़ी हुई है। इन संसाधनों की रक्षा करना केवल किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने समाज के लोगों से अपील करते हुए कहा कि अपनी आने वाली पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ें तथा बच्चों को अपने अधिकारों और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक करें।उन्होंने कहा कि एकजुट समाज ही अपने अधिकारों की मजबूती से लड़ाई लड़ सकता है। समाज में आपसी भाईचारा, एकता और सहयोग बना रहना जरूरी है। उन्होंने युवाओं से भी आगे आकर समाज के विकास में अपनी भूमिका निभाने का आह्वान किया।कर्रीचलगली के बाद जामवंतपुर में भी विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर भव्य रैली निकाली गई। रैली में बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग शामिल हुए। पारंपरिक वेशभूषा में महिला, पुरुष, युवा और बच्चे रैली का हिस्सा बने। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक गीत-संगीत के साथ निकली रैली ने पूरे क्षेत्र का माहौल उत्सवमय कर दिया।रैली के दौरान आदिवासी समाज की संस्कृति और परंपरा की झलक देखने को मिली। समाज के लोगों ने अपनी एकजुटता का परिचय देते हुए अपनी संस्कृति और अधिकारों के संरक्षण का संदेश दिया। रैली जामवंतपुर बाजार पहुंची, जहां सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।सांस्कृतिक कार्यक्रम में आदिवासी समाज की लोक कला, पारंपरिक नृत्य और गीतों की मनमोहक प्रस्तुतियां दी गईं। बच्चों और युवाओं ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने कलाकारों का उत्साह बढ़ाया और आदिवासी संस्कृति की इस खूबसूरत प्रस्तुति की सराहना की।कार्यक्रम के दौरान समाज के प्रतिनिधियों ने भी लोगों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि आधुनिकता के दौर में अपनी संस्कृति और परंपराओं को बचाए रखना बेहद जरूरी है। नई पीढ़ी यदि अपनी जड़ों और इतिहास को जानेगी, तभी आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकेगी।विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर बलरामपुर जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में आयोजित कार्यक्रमों ने यह संदेश दिया कि आदिवासी समाज अपनी संस्कृति, परंपरा और अधिकारों को लेकर जागरूक है और अपनी पहचान के लिए एकजुट होकर आगे बढ़ रहा है।पूरे जिले में निकली रैलियों और आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में समाज के लोगों की बड़ी भागीदारी रही। कहीं पारंपरिक नृत्य ने लोगों का मन मोहा तो कहीं ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच लोगों ने अपनी सामाजिक एकता का प्रदर्शन किया।विश्व आदिवासी दिवस का यह आयोजन केवल उत्सव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज की एकता, संस्कृति के संरक्षण और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों की रक्षा के संकल्प का प्रतीक बनकर सामने आया। बलरामपुर में जगह-जगह उमड़ा आदिवासी समाज का जनसैलाब यह बताता नजर आया कि अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति और अपनी पहचान से जुड़ा समाज आज भी अपनी जड़ों को मजबूती से थामे हुए है।
