छत्तीसगढ़ की मौजूदा सरकार को सत्ता संभाले ढाई साल पूरे हो चुके हैं। पांच साल के कार्यकाल का आधा रास्ता लगभग पार हो चुका है। ऐसे समय में सरकार के सामने केवल अपनी उपलब्धियां गिनाने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह साबित करने की जिम्मेदारी भी है कि जिन उम्मीदों और वादों के साथ जनता ने उसे सत्ता सौंपी थी, उनमें से कितने धरातल पर उतरे और कितने अभी फाइलों, घोषणाओं और राजनीतिक भाषणों में हैं।
ढाई साल किसी सरकार के मूल्यांकन के लिए कम समय नहीं होता। यह वह पड़ाव है जहां शुरुआती दावों और वास्तविक परिणामों के बीच का अंतर दिखाई देने लगता है।
सरकार निश्चित रूप से अपनी योजनाओं, फैसलों और विकास कार्यों को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करेगी। यह उसका अधिकार भी है और जनता को यह बताना उसकी जिम्मेदारी भी कि उसने ढाई साल में क्या किया। लेकिन लोकतंत्र में सरकार का मूल्यांकन केवल सरकारी विज्ञापनों और प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं होता। असली रिपोर्ट कार्ड उस नागरिक के पास होता है जो सरकारी अस्पताल में इलाज कराने जाता है, वह युवा जो रोजगार की तलाश में है, वह किसान जो अपनी फसल की कीमत को लेकर चिंतित है और वह ग्रामीण परिवार जो आज भी बुनियादी सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रहा है।
यहीं से सवाल शुरू होते हैं।
क्या ढाई साल में स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर उतनी बदली है जितनी बदलने का दावा किया गया? क्या सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार आया? क्या युवाओं को पर्याप्त रोजगार के अवसर मिले? क्या किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हुई? क्या दूरस्थ आदिवासी अंचलों तक विकास की गति तेज हुई?
इन सवालों का जवाब आंकड़ों से भी देना होगा और जमीन पर जाकर भी।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहां विकास का पैमाना केवल राजधानी या बड़े शहर नहीं हो सकते। यदि रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग या दूसरे प्रमुख शहरों में विकास दिखाई देता है, तो उसकी वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब उसका असर बस्तर, सरगुजा, कोरिया, सूरजपुर, जशपुर, कोरबा और प्रदेश के दूरस्थ गांवों तक भी समान रूप से दिखाई दे।
सरकार के लिए ढाई साल का यह पड़ाव आत्ममंथन का समय है। जो वादे पूरे हुए, उन्हें मजबूती से जनता के सामने रखा जाए। जो अधूरे हैं, उनके लिए समयबद्ध रोडमैप दिया जाए और जिन योजनाओं में अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, वहां सुधार की ईमानदार कोशिश हो।
लेकिन इस बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है—विपक्ष।
सरकार की आलोचना करना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन केवल विरोध करना उसकी पूरी जिम्मेदारी नहीं। यदि सरकार किसी योजना में विफल है तो विपक्ष को यह भी बताना चाहिए कि उसका बेहतर विकल्प क्या है। जनता को केवल यह सुनने में रुचि नहीं कि सरकार गलत है; वह यह भी जानना चाहती है कि विकल्प क्या है?
यही वह जगह है जहां छत्तीसगढ़ की राजनीति को अपनी गुणवत्ता सुधारने की जरूरत है।
ढाई साल पूरे होने के बाद प्रदेश को आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर “रिपोर्ट कार्ड की राजनीति” की ओर जाना चाहिए। सरकार अपना रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखे और विपक्ष अपना वैकल्पिक रिपोर्ट कार्ड। दोनों पक्ष यह बताएं कि स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, किसान, महिला सुरक्षा, आदिवासी विकास, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता के क्षेत्र में उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं।
जनता को तय करने दीजिए कि किसका दावा कितना सच्चा है।
आज सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक है। असली खतरा तब पैदा होता है जब राजनीतिक बहस इतनी शोरगुल वाली हो जाए कि जनता के वास्तविक सवाल सुनाई ही न दें।
ढाई साल पूरे हो गए हैं। अब भाषणों का नहीं, परिणामों का समय है।
सरकार को यह समझना होगा कि सत्ता में आने के बाद जनता विरोधी नहीं हो जाती और आलोचना करने वाला हर व्यक्ति राजनीतिक दुश्मन नहीं होता। लोकतंत्र में आलोचना शासन को कमजोर नहीं करती; सही आलोचना शासन को बेहतर बनाती है।
विपक्ष को भी यह समझना होगा कि हर सरकारी काम का विरोध जनता को प्रभावित नहीं करता। जनता भावनात्मक नारों से ज्यादा अपने रोजमर्रा के जीवन में बदलाव देखना चाहती है।
आखिरकार अगले ढाई साल केवल सरकार के लिए नहीं, विपक्ष के लिए भी परीक्षा हैं।
सरकार के पास यह साबित करने के लिए ढाई साल हैं कि उसके वादे केवल चुनावी घोषणा नहीं थे। विपक्ष के पास भी ढाई साल हैं यह साबित करने के लिए कि वह केवल सत्ता की आलोचना करने वाली संस्था नहीं, बल्कि बेहतर शासन का विश्वसनीय विकल्प बन सकता है।
छत्तीसगढ़ की जनता अब शायद यही पूछ रही है—
ढाई साल हो गए, अब तक क्या बदला?
और जो नहीं बदला, वह कब बदलेगा?
यह सवाल किसी एक दल का नहीं है।
यह सवाल पूरे राजनीतिक तंत्र से है।
क्योंकि चुनाव जीतना राजनीति की शुरुआत हो सकती है, लेकिन जनता का भरोसा बनाए रखना ही शासन की असली सफलता है।
ढाई साल बीत चुके हैं।
अब छत्तीसगढ़ को वादों की नहीं, काम की राजनीति चाहिए।
घोषणाओं की नहीं, परिणामों की राजनीति चाहिए।
और सबसे बढ़कर—कुर्सी की नहीं, जनता के भरोसे की राजनीति चाहिए।
