आरकेएम, डीबी और वेदान्ता कंपनियों पर विधायक रामकुमार यादव का हमला — ‘सपने दिखाकर जमीन ली, अब मजदूरों को दो वक्त की रोटी भी मुश्किल’

डोलकुमार निषाद@डभरा/सक्ती:-
भू-विस्थापित कर्मचारियों के आंदोलन को अब राजनीतिक ताप भी मिलने लगा है। चंद्रपुर विधायक रामकुमार यादव आंदोलनरत कर्मचारियों के समर्थन में पहुंचे और पावर कंपनियों पर जमकर निशाना साधा। मंच से विधायक ने ऐसा बयान दिया, जिसने मजदूरों के दर्द और कंपनियों की कार्यशैली पर कई सवाल खड़े कर दिए।

विधायक ने कहा कि आरकेएम, डीबी और वेदान्ता जैसी कंपनियों ने इलाके की जमीन और पानी लिया, बदले में रोजगार, अस्पताल और विकास के सपने दिखाए, लेकिन आज हालात यह हैं कि भू-विस्थापित परिवारों के लोग 10–11 हजार रुपये की तनख्वाह में जिंदगी ढोने को मजबूर हैं।

उन्होंने तंज कसते हुए कहा.
“इतनी महंगाई के बीच 10 हजार रुपये में क्या होगा साहब? आज तो 10 हजार में दारू की बोतल भी न आये,, तो मजदूर का घर कैसे चलेगा.?”

विधायक ने सरकार और कंपनियों से सवाल पूछा कि जब बिजली का रेट आम आदमी के लिए बढ़ सकता है, तो फिर मजदूरों का वेतन इतने वर्षों बाद भी क्यों नहीं बढ़ा? क्या मुनाफे की बिजली केवल कंपनी के मीटर में दौड़ेगी और मजदूर की थाली खाली ही रहेगी..?

रामकुमार यादव ने कहा कि जिस जमीन पर आज उद्योग खड़े हैं, वह कभी स्थानीय ग्रामीणों की थी। तब वादे किए गए थे कि “यहां के बच्चे बड़े अफसर बनेंगे, रोजगार मिलेगा, अस्पताल खुलेगा”, लेकिन आज मजदूरों को अपने ही हक के लिए धरने पर बैठना पड़ रहा है।

विधायक ने यह भी आरोप लगाया कि प्रदेश के कर्मचारियों के लिए वेतनमान और महंगाई भत्ते की चर्चा होती है, लेकिन मजदूरों की तनख्वाह पर कोई गंभीरता नहीं दिखती। उन्होंने सवाल उठाया कि केंद्र की एजेंसियों के बराबर भुगतान की बात करने वाली व्यवस्था आखिर स्थानीय मजदूरों के साथ अलग व्यवहार क्यों करती है?

आंदोलन के सात दिन पूरे होने का जिक्र करते हुए विधायक ने सरकार पर नाराजगी जताई और छत्तीसगढ़ी कहावत के जरिए तंज कसा-
“जिसे अपना बच्चा समझते हैं, उसका ख्याल रखा जाता है… लेकिन सरकार हमें शायद मौसी का बच्चा समझ रही है।”

अपने बयान के अंत में विधायक ने चेतावनी भरे लहजे में कहा-
“गरीबों के आंसू कहीं फौलाद न बन जाएं। सरकार गरीबों को सताना बंद करे और उनकी हर मांग पर गंभीरता से विचार करे।”

अब सवाल यह है कि क्या कंपनियों और सरकार तक भू-विस्थापितों की आवाज पहुंचेगी, या फिर आंदोलन की आग और भड़कने का इंतजार किया जाएगा?

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