आर.के.एम. पावर प्लांट के भू-विस्थापित कर्मचारियों का आरोप- “काम हमारा, तरक्की ठेकेदार की!”
डोलकुमार निषाद@सक्ती/डभरा:
“बिजली बनाओ, पसीना बहाओ… और बदले में आश्वासन का बिल पकड़ जाओ!”- कुछ ऐसा ही दर्द अब आर.के.एम. पावर प्लांट के भू-विस्थापित कर्मचारियों की जुबान पर दिखाई दे रहा है। वर्षों से कंपनी के पहियों को घुमाने वाले श्रमिक अब खुद को “स्थायी अस्थायी” कर्मचारी बताने लगे हैं।

भू-विस्थापित कर्मचारियों द्वारा एसडीएम को सौंपे गए आवेदन में आरोप लगाया गया है कि कंपनी में स्थायी नौकरी और वेतन बढ़ोतरी की मांग वर्षों से फाइलों में ऐसे घूम रही है, मानो “विकास” की ट्रेन बिना टिकट निकल गई हो और कर्मचारी प्लेटफॉर्म पर ही खड़े रह गए हों।
आवेदन में कर्मचारियों ने साफ कहा है कि जब भी वे अपने हक और संवैधानिक मांगों को लेकर कंपनी प्रबंधन तक पहुंचते हैं, उनकी मांगों को गंभीरता से लेने के बजाय “अनदेखी विभाग” में भेज दिया जाता है। इतना ही नहीं, आरोप है कि कार्यस्थल पर दूसरे ठेकेदारों के लोगों को रखकर पुराने कर्मचारियों पर दबाव बनाया जाता है और काम से वंचित करने की धमकी भी दी जाती है।

जिस जमीन ने कंपनी को खड़ा किया, उसी जमीन से जुड़े परिवार आज रोजगार और सम्मान के लिए ज्ञापन पर ज्ञापन देने को मजबूर हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि बिजली उत्पादन में बढ़ोतरी संभव है, तो मजदूरों की तनख्वाह बढ़ाना इतना कठिन क्यों?

कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रबंधन का रवैया नहीं बदला तो वे अपने परिवार के साथ भूख हड़ताल और कंपनी की कोयला परिवहन सड़क जाम करने जैसे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे। आवेदन में स्पष्ट कहा गया है कि स्थिति बिगड़ने पर इसकी जिम्मेदारी कंपनी प्रबंधन और प्रशासन की होगी,,।
अब देखने वाली बात यह होगी कि कंपनी प्रबंधन इस आवेदन को “कागजी करंट” समझकर छोड़ देता है या फिर कर्मचारियों की मांगों में सचमुच कोई बिजली दौड़ती है।
