डोलकुमार निषाद

डभरा ब्लॉक के कोटमी, बघौद, शंकरपाली, धुरकोट, किरारी, कांसा सहित दर्जनों गांवों में प्रतिबंध के बावजूद किसान खुलेआम खेतों में धान की पराली जलाते देखे जा रहे हैं। खेतों में पराली जलाने से जहां एक ओर वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर भूमि की उर्वरता पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है।

प्रशासन का प्रतिबंध, लेकिन जमीनी स्तर पर कमी

प्रशासन द्वारा पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए खेतों में धान की पराली जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर प्रभावी अमल नहीं हो पा रहा है। किसानों का कहना है कि उन्हें पराली प्रबंधन के वैकल्पिक उपायों की पर्याप्त जानकारी नहीं मिल पा रही है।ग्रामीणों का आरोप है कि डभरा ब्लॉक में कृषि विभाग द्वारा किसी प्रकार का ठोस जागरूकता अभियान नहीं चलाया जा रहा है। जागरूकता की कमी के कारण किसान परंपरागत तरीके से पराली जला रहे हैं।

भूमि की उर्वरता पर असर

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार पराली जलाने से खेत की मिट्टी का तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है, जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम होती है। मिट्टी में मौजूद लाभकारी कीट एवं सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं, जिसका सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ता है। लंबे समय तक पराली जलाने से जमीन बंजर होने का खतरा भी बढ़ सकता है।

मवेशियों पर भी पड़ रहा असर

पराली जलाए जाने के कारण खेतों में पशुओं के लिए चारा उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। कई स्थानों पर मवेशियों को भटकते हुए देखा गया है। कोटमी क्षेत्र में तो शराब दुकान के पीछे शराब की पेटियों के कार्टून खाते हुए मवेशी नजर आ रहे हैं, जो पशुपालन की स्थिति पर भी सवाल खड़े करता है।

बढ़ता प्रदूषण, खतरे में पर्यावरण

पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वातावरण में घुलकर वायु गुणवत्ता को खराब करता है। इससे सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह अधिक हानिकारक साबित हो सकता है।

जरूरी है ठोस पहल

कृषि विभाग द्वारा गांव-गांव में जागरूकता अभियान चलाया जाए,,पराली प्रबंधन के लिए मशीनों एवं वैकल्पिक उपायों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए,,नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए,,पशुओं के लिए वैकल्पिक चारा व्यवस्था पर ध्यान दिया जाए,,,यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो पर्यावरण, खेती और पशुपालन — तीनों पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

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