निविदा प्रक्रिया और नियमों की अनदेखी के आरोपों से घिरा जीर्णोद्धार कार्य, महज कुछ हजार के काम पर उठे सवाल; जिला अध्यक्ष पहुंचे, घोषित अतिथि नदारद

बाराद्वार। नगर पंचायत बाराद्वार में निकाय सरकार और भाजपा संगठन के बीच कथित खींचतान अब सार्वजनिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रह गई है। एल्डरमैन निधि से कराए गए चबूतरे के जीर्णोद्धार कार्य का लोकार्पण जहां राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है, वहीं अब कार्य की प्रक्रिया और लागत को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। एक ओर आमंत्रण पत्र में घोषित अतिथियों की गैरमौजूदगी ने संगठन और निकाय के बीच तालमेल पर सवाल खड़े किए, तो दूसरी ओर कार्य में निविदा प्रक्रिया सहित जरूरी नियमों की अनदेखी किए जाने के आरोपों ने मामले को और गंभीर बना दिया है।

लोकार्पण में अतिथियों की गैरमौजूदगी, आखिर क्या है वजह?

19 अक्टूबर को आयोजित चबूतरा जीर्णोद्धार कार्य के लोकार्पण कार्यक्रम के लिए सोशल मीडिया पर बाकायदा आमंत्रण पत्र जारी कर प्रचार-प्रसार किया गया था। आमंत्रण पत्र में सांसद को मुख्य अतिथि, भाजपा जिला अध्यक्ष टिकेश्वर गवेल को विशिष्ट अतिथि तथा नगर पंचायत अध्यक्ष को कार्यक्रम की अध्यक्षता के लिए आमंत्रित बताया गया था। इसके अलावा मंडल अध्यक्ष और नगर पंचायत उपाध्यक्ष के नाम भी अतिथियों की सूची में शामिल थे। आयोजक के रूप में भारतीय जनता पार्टी बाराद्वार मंडल का उल्लेख किया गया था।

लेकिन कार्यक्रम के दिन भाजपा जिला अध्यक्ष टिकेश्वर गवेल को छोड़कर घोषित प्रमुख अतिथियों की गैरमौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए। जिस आयोजन का बाकायदा प्रचार किया गया, उसमें अपेक्षित जनप्रतिनिधियों की अनुपस्थिति को लेकर अब स्थानीय राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। सवाल यह है कि क्या यह महज संयोग था या फिर संगठन और निकाय के बीच चल रही कथित खींचतान का असर इस कार्यक्रम में भी दिखाई दिया?

कार्य की लागत और निविदा प्रक्रिया पर उठे सवाल

मामले में अब सबसे अहम सवाल चबूतरे के जीर्णोद्धार कार्य को लेकर उठ रहे हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, आरोप लगाए जा रहे हैं कि कार्य को संपन्न कराने में निविदा प्रक्रिया सहित आवश्यक नियमों का पालन नहीं किया गया। वहीं, चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि संबंधित कार्य की वास्तविक लागत महज कुछ हजार रुपये के आसपास ही रही होगी। हालांकि, कार्य की वास्तविक लागत, स्वीकृत राशि और अपनाई गई प्रक्रिया की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।

यदि कार्य में निर्धारित नियमों और प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है, तो यह केवल एक छोटे निर्माण कार्य का मामला नहीं रह जाता, बल्कि सार्वजनिक निधि के उपयोग और निकाय की कार्यप्रणाली से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल बन जाता है। आखिर कार्य की प्रशासनिक स्वीकृति किस आधार पर मिली? इसकी लागत कितनी निर्धारित की गई थी? क्या नियमानुसार निविदा या अन्य निर्धारित प्रक्रिया अपनाई गई? कार्य किस एजेंसी अथवा व्यक्ति से कराया गया और भुगतान किस आधार पर किया गया? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।

क्या संगठन की नजदीकी नियमों से ऊपर हो गई?

इस पूरे घटनाक्रम में एक और सवाल राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। जब एल्डरमैन निधि से कार्य कराया गया, तो क्या संबंधित प्रक्रिया में नगर पंचायत प्रशासन की निर्धारित भूमिका का पूरी तरह पालन किया गया? यदि नियमों की अनदेखी हुई है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी बनती है? और यदि सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार पूरी की गई हैं, तो संबंधित दस्तावेज सामने रखकर उठ रहे सवालों का जवाब क्यों नहीं दिया जाना चाहिए?

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी हो रही है कि कहीं संगठन में बैठे लोगों की कथित संलिप्तता या प्रभाव के चलते आवश्यक प्रक्रियाओं को नजरअंदाज तो नहीं किया गया? फिलहाल यह सवाल और आरोप हैं, जिनकी पुष्टि संबंधित दस्तावेजों और प्रशासनिक जांच से ही हो सकती है। लेकिन इतना तय है कि सार्वजनिक निधि से होने वाले कार्यों में पारदर्शिता और नियमों का पालन किसी भी राजनीतिक संगठन की प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण है।

कार्य नगर पंचायत का, आमंत्रण में प्रशासन गायब!

आमंत्रण पत्र में भाजपा पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के नाम प्रमुखता से दर्ज थे, लेकिन मुख्य नगर पालिका अधिकारी का नाम शामिल नहीं होने से भी सवाल उठे। आखिर एल्डरमैन निधि से कराए गए कार्य के लोकार्पण को किस रूप में प्रस्तुत किया गया? क्या यह नगर पंचायत से जुड़ा आधिकारिक आयोजन था या संगठन के कार्यक्रम के रूप में इसकी रूपरेखा तैयार की गई थी? निकाय प्रशासन की भूमिका और कार्यक्रम की व्यवस्था को लेकर स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है।

एक तरफ नगर पंचायत में भाजपा समर्थित जनप्रतिनिधि हैं, दूसरी तरफ संगठन के पदाधिकारी हैं। ऐसे में यदि दोनों के बीच समन्वय की कमी सामने आती है, तो इसका असर केवल राजनीतिक गतिविधियों पर ही नहीं, बल्कि नगर के विकास कार्यों की छवि पर भी पड़ता है। सवाल यह भी है कि जब अपनी ही पार्टी के जनप्रतिनिधि निकाय में मौजूद हैं, तो आपसी तालमेल की ऐसी स्थिति क्यों बन रही है?

अपनों की सरकार में अपनों के बीच ही दूरी क्यों?

बाराद्वार की स्थानीय राजनीति में पहले से ही संगठन और निकाय के बीच तालमेल को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। अब चबूतरा जीर्णोद्धार कार्य के लोकार्पण में घोषित अतिथियों की अनुपस्थिति और कार्य की प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों ने इन चर्चाओं को नया आधार दे दिया है। कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब विकास कार्यों का उद्देश्य जनता को सुविधा देना है, तो उनके क्रियान्वयन में पारदर्शिता और राजनीतिक समन्वय क्यों सुनिश्चित नहीं हो पा रहा?

भाजपा लगातार सुशासन, पारदर्शिता और विकास की बात करती है। ऐसे में पार्टी से जुड़े जनप्रतिनिधियों और संगठन के पदाधिकारियों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि सार्वजनिक निधि से होने वाले प्रत्येक कार्य में नियमों का पालन हो तथा किसी भी तरह के संदेह की गुंजाइश न रहे।

अब जवाबदेही तय होगी या मामला चर्चाओं में ही सिमट जाएगा?

फिलहाल चबूतरे का लोकार्पण भले ही छोटा आयोजन रहा हो, लेकिन इसने बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर घोषित अतिथियों की गैरमौजूदगी ने संगठन और निकाय के बीच कथित खींचतान को चर्चा में ला दिया है, तो दूसरी ओर निविदा प्रक्रिया, कार्य की वास्तविक लागत और नियमों के पालन को लेकर उठे सवालों ने मामले को जवाबदेही से जोड़ दिया है।

अब निगाहें नगर पंचायत प्रशासन और संबंधित जिम्मेदारों पर हैं कि वे कार्य की स्वीकृत राशि, लागत, भुगतान तथा अपनाई गई प्रक्रिया को लेकर स्थिति स्पष्ट करते हैं या नहीं। क्योंकि सवाल सिर्फ चबूतरे के जीर्णोद्धार का नहीं है, सवाल यह भी है कि सार्वजनिक निधि से होने वाले कार्यों में नियम सर्वोपरि हैं या राजनीतिक रसूख?

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