डोलकुमार निषाद@सक्ती/डभरा-: वेदांता पावर प्लांट का 14 अप्रैल का काला मंगलवार अब सिर्फ हादसा नहीं, बल्कि मजदूरों के साथ हुआ खुला अन्याय बनता जा रहा है। इस भीषण हादसे में अब तक 24 मजदूरों की जान जा चुकी है, जबकि 12 मजदूर मौत से जंग लड़ रहे हैं—लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

हादसे के बाद से प्लांट पर ताला लटक गया है और इसके साथ ही करीब 7 हजार मजदूरों की रोजी-रोटी भी छिन गई। जिन हाथों ने इस प्लांट को खड़ा किया, आज वही हाथ बेरोजगारी और भूख की मार झेलने को मजबूर हैं।
प्रबंधन की संवेदनहीनता देखिए—घायलों को इलाज तक वेतन देने की बात तो की जा रही है, लेकिन हजारों परिवारों के चूल्हे कैसे जलेंगे, इस पर एक शब्द नहीं। क्या मजदूरों की जिंदगी की कीमत सिर्फ हादसे तक ही सीमित है?
सूत्रों का बड़ा खुलासा—हादसे के वक्त अंदर मौजूद मजदूरों को जल्दी-जल्दी बाहर खदेड़ा गया, ताकि प्लांट के भीतर की सच्चाई बाहर न आ सके। अगर ये सच है, तो सवाल और भी खतरनाक हो जाता है—क्या सच्चाई छिपाई जा रही है?

सबसे बड़ा सवाल—इतने बड़े हादसे के बाद भी प्रबंधन पूरी तरह चुप क्यों है?
ना कोई जवाब, ना कोई जिम्मेदारी—बस सन्नाटा!
आज मजदूर क्वार्टर वीरान हैं, लेकिन इन खाली दीवारों के पीछे सैकड़ों परिवारों की भूख, बेबसी और गुस्सा चीख रहा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पूरे घटनाक्रम पर अब तक प्लांट प्रबंधन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। इससे संदेह और भी गहरा गया है।
हादसे के बाद जहां एक ओर मजदूर क्वार्टर वीरान हो चुके हैं, वहीं दूसरी ओर हजारों परिवारों पर आर्थिक और मानसिक संकट गहराता जा रहा है। अब देखना होगा कि प्रशासन और जिम्मेदार एजेंसियां इस गंभीर स्थिति पर कब और क्या कदम उठाती हैं।
अब सवाल सीधा है—
क्या मजदूरों की जान और रोजगार की कोई कीमत नहीं? या फिर ये भी किसी फाइल में दबा दिया जाएगा?
