
भारत में पिछले कुछ वर्षों से 14 फरवरी की तारीख को लेकर एक बड़ा वैचारिक बदलाव देखा जा रहा है। जहाँ दुनिया भर में इसे ‘वैलेंटाइन डे’ के रूप में मनाया जाता है, वहीं हिंदू समाज के बड़े वर्ग में अब इसे ‘मातृ-पितृ पूजन दिवस’ (Parents’ Worship Day) के रूप में मनाने की परंपरा तेजी से लोकप्रिय हुई है।इस मुहिम की नींव वर्ष 2007 में रखी गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से हटाकर अपनी जड़ों और पारिवारिक मूल्यों की ओर वापस लाना था। इस दिवस के पीछे तर्क दिया जाता है कि प्रेम की शुरुआत कामुकता से नहीं, बल्कि उस निस्वार्थ भाव से होनी चाहिए जो माता-पिता अपनी संतान के प्रति रखते हैं।इस दिन का धार्मिक आधार भगवान गणेश की उस कथा से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने पूरे ब्रह्मांड के चक्कर लगाने के बजाय अपने माता-पिता (भगवान शिव और माता पार्वती) की परिक्रमा की थी। उन्होंने सिद्ध किया कि माता-पिता के चरणों में ही सारा संसार निहित है।इस दिवस की बढ़ती लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे राज्यों ने पूर्व में इसे स्कूलों और सरकारी संस्थानों में आधिकारिक रूप से मनाने के निर्देश जारी किए थे। आज यह केवल एक धार्मिक आयोजन न रहकर एक सामाजिक आंदोलन बन चुका है।इस दिन देश भर के स्कूलों, आश्रमों और मोहल्लों में सामूहिक पूजन कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। बच्चे अपने माता-पिता को ऊंचे आसन पर बैठाकर उनका तिलक करते हैं, फूल माला पहनाते हैं, उनकी आरती उतारते हैं और उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं। यह दृश्य नई पीढ़ी में कृतज्ञता और सम्मान का भाव भरता है।

